जब से ‘मेरे’मुझ पर मेहरबान हो गये

काफिले दर्द वाले आसान हो गये,

हमराह,हमकदम हमसफ़र थे जो कभी

दिल्लगी की राह में कुर्बान हो गये,

दे कर दगा पूछते हैं अब ,कि क्या हुआ

कैसे-कैसे माहिर नादान हो गये,

देते थे हर किसी को वफ़ा का ,जो वास्ता

हवा का रुख् बदलते ही बेइमान हो गये,

तिनकों की तलाश में दरबदर क्या हुऐ

परिंदे घोंसलों में मेहमान हो गये |

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