लफ़्ज लफ़्ज बंट गया,गीत बन संवर गया

आज कोई दर्द दिल में हद से फिर गुजर गया

     हर तरफ ही शोर है कि क्या हुआ ये क्या हुआ

    है वही खामोश जिसका  आशियां उजड़ गया

आज कोई ……….

    जिसके लिये साया बना , तन जलाया धूप में

    तन्हा पेड़ शाम ढले सोचे, वो किधर गया

आज कोई ………

       खुदपरस्ती खेलती है, दाँव शतरंज के

        हर तरफ दीवारें हैं, जाने कहाँ घर गया

आज कोई ………….

        इस कदर दुश्वार हुए  जिन्दगी के रास्ते

        कदम लड़खड़ा गये, हौंसला बिखर गया

आज कोई ………

बस यही एक बहाना कि फुरसत नही है

बात इतनी सी है कि मोहब्बत नही है

                 हक़ ही नही तो उलझना ही कैसा

                 इसलिये अब लबों पे शिकायत नही है

बातों में नजा़कत ,नज़र में अदब ही

इन बहारों में पहले सी रंगत नही है

                   तूफां मे घिरे हैं , न कश्ती न साहिल

                     फिर तेरी भी कुछ कम , इनायत नही है

हर तदबीर नाकाम,हर दुआ बेअसर

बाखु़दा बाकी अब कोई हसरत नही है

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बेहद बेइख्तियार क्यों है

जाने दिल बेकरार क्यों है

   कहीं नही कोई जो मुड़कर देखे

  फिर भी एक इंतजार क्यों है

नूर है, रंग भी है फिर भी

वो कली  बेज़ार क्यों है

     हवाअों  में बसर नही होती

   आसमां से इतना प्यार क्यों है

उसे पता है ,मसलहत क्या है

कि आईना शर्मसार क्यों है

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ख्यालों की महफिल सजाती रही

रात भर मैं तुझे गुनगुनाती रही

            कोई झोंका हवा जो छूकर गया

           तू मेरे पास है मुझको ऐसा लगा

           उम्मीदों की लौ झिलमिलाती रही

         रात भर …………..

बारिशों की तरह दिल मचलता रहा

ख्वाहिशों का सफर यूँ ही चलता रहा

याद अाती रही,जान जाती रही 

रात भर …………..

          फिर कभी काश ऐसी ही बरसात हो

           शर्त ये है मगर , तू मेरे साथ हो

            पल पल दुआअों में लाती रही

           रात भर ……….

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धुंधली फीकी तस्वीरों में सिमटा छुटपन  ढूंढ रही हूँ

फिर वो बचपन ढूंढ रही हूँ

           मिट्टी के वो खेल  खिलौने

           दाढ़ी वाले ्ऋषि सलोने

           खूब ठुमकने वाली गुड़िया

           सिर मटकाते बुड्ढे बुढ़िया

मेले में इतराते घूमते,चंचल पलछिन ढूढ रही हूँ

फिर वो ………….

         अचरज से वो तारे गिनना

         राजा रानी परियां सुनना

          धमा चौकड़ी ,उधम मचाना

          इसे सताना उसे मनाना

बेफिक्री में डूबी रातें ,मतवाले दिन ढूंढ रही हूँ

फिर वो ……………..

           फल फूलों से लदी डालियां

           खेतों में लहराती बालियां

          सरसों गेंहू चना बाजरा

          गाँव मखमली हरा हरा

धूल उड़ाती पगडंडी ,पायल की रुनझुन ढूंढ रही हूँ

फिर वो ……….

          सब कुछ लगता अपना अपना

        जीवन जैसे सुन्दर सपना

        हर मन निर्मल धुला धुला

        स्नेह हवा में घुला घुला

खुली खिड़कियों वाले घर , भीगते आंगन ढूंढ रही हूँ

फिर वो ……….

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बाल गीत

चंदा मामा नीचे आओ

छोटी सी एक बात बताओ

        रोज़ रात में आते हो

        दिन में तुम छिप जाते हो

हम बच्चे थक जाते हैं

शाम ढले सो जाते हैं

          कभी तो दिन में आओ ना

          संग खेलो बतलाओ ना

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कोयल प्यारी काली काली

सारे जग से है मतवाली

        जब जब ये अपना मुँह खोले

        कानो में मिसरी सी घोले

कभी नज़र नही आती है

पत्तो  में छिप जाती है

        रंग रूप पर ध्यान न दो

       बोली में अम्ृत घोलो

दिल के अहसास में जिन्दा हूँ कहाँ जाऊँगा

जब भी बंद होगी, उन आँखो में उतर आऊँगा

हर घड़ी सोचते रहने की जरूरत क्या है

आईना देख लो खुशबू सा बिखर जाऊँगा

तन्हा रहता हूँ अंधेरो से वास्ता मेरा

मैं तो साया हूँ उजालो में मर जाऊँगा

माना अभी तुमको जरुरत नही मेरी

एक दिन ढूंढोगे ,मै वक्त सा गुजर जाऊँगा

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इस तरह हालात को अपने छुपा लिया

उसकी नजर में खुद  को मुजरिम  बना लिया

कुछ न जब जुबान से  कहते हूये बना

सिर को झुका कर थोड़ा मुस्कुरा लिया

तू भी कभी तड़प के न रह जाये तो कहना

वो तो हम थे कि बेवफा से निभा लिया

अब जाके मुझे मेरी वफा  का सिला मिला

मिलते ही निगाह उसने नज़र को झुका लिया

खुदा सब्र बख्शे तुझको करार दे

ले मैंने खुद को तेराआइना बना लिया

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