गुर्बत के आलम मे अंदाज शहाना है

ऐसा भी बस्ती मे कोई दीवाना है

क्या बिसात मुफलिसी की,रंजो गम क्या करिये

दर्दे दिल से जिसका अरे इश्क पुराना है

जज्बात की तस्वीरें न चेहरे पे नुमाया हो

हर शय से नजाकत को ,हर हाल बचाना है

बहते हुए दरिया को तूफान क्या रोकेगा

ये एक हकीकत है वो एक फसाना है

चैन गजब का है इस मस्त फकीरी में

बाहों में आसमां है कदमो में जमाना है।

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कर बद्ध विनय तुमसे पालक,पुनः जग बन्धन स्वीकार करो

व्याकुल धरणी निष्प्राण न हो,अविलम्ब नया अवतार धरो

कोमल सुन्दर तेरी रचना   मुरझाई,    आह! नष्ट न हो

ध्येय  कर्म।   धर्म भूली   मदान्ध हुई,    पथ भ्र्ष्ट न हो

छल दम्भ कपट मुखरित हो निकृष्टता का आधार हुए

मान प्रणय संयम विसरित ,विस्मृत हो निराधार हुए

लोभ दमन के पाश  बंधी,  मानवता  मरणासन्न है

परहित पर-उपकार विगत,व्यभिचार का बंधन है

यथा योग्य अनुकूलन हो,ताप त्राहि तम त्रास हरो

पुनः जग बन्धन स्वीकार करो,अविलम्ब नया अवतार धरो।

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मंद पवन नित गंध सुगन्ध नई

पल्लवित् लताओं संग खेलती बयार है

चहूँ दिसि कुसुमित दल बल कुसुमो के

धरा धरनी ने देखो नया अवतार है

योगी जोगी रूप धर अलि दल कुंजन मे में

कली संग प्रेम मद भरी मनुहार है

झोंको संग इठलाये भरमाये  भ्रमर को

है मौन निमन्त्रण अब कौन बिचार है

धन धन धरा हुई आओ ऋतुराज आओ

जुहार है बसंत को ,बसंत को जुहार है

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