एक बालगीत
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चंदा मामा नीचे आओ
छोटी सी एक बात बताओ
रोज रात में आते हो
दिन में तुम छिप जाते हो
हम बच्चे थक जाते हैं
शाम ढले सो जाते हैं
कभी तो दिन में आओ ना
संग खेलो बतियाओ ना ।।

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🙏

हे शिक्षा के व्यापारी !
कितना लोभ है तुम्हें माया का?
विद्यालय को व्यवसायिक प्रतिष्ठान बना दिया । पुस्तकें,
विशेष परिधान, पैन, रंग बस्ते, और ना जाने क्या क्या? सब बिक रहा है ।
अभिभावक बिना चूं चा के आपका साथ दिये जा रहे है ।
आखिर प्रतिष्ठा का प्रश्न है
और कोई अगर विरोध करने का प्रयास भी करता है तो बच्चे के भविष्य का भूत दिखा दिया जाता है ।
मजबूरी है ।
यहाँ तक तो ठीक था किन्तु?
अब परीक्षा को भी नही छोड़ा?
दिन रात कडे परिश्रम करने की इतनी बड़ी सजा ।
प्रश्न पत्र ही बेच डाला!
एक बार नही सोचा विद्यार्थी के आत्मविश्वास, उसके भविष्य के बारे मे ।
कितना मिला ?
बस कुछ कागज के टुकड़े !
हो सकता है तुम्हारे परिवार का कोई इस कुकर्म से घायल हुआ हो ।
लज्जा नही आई !
कैसे सामना करोगे ?
और अगर इससे भी कोई फर्क नही पड़ता तुम्हें तो अपने मनुष्य होने की कुछ तो लाज रखो ।
छोड़ दो इन विद्यार्थियो को इनके हाल पर🙏
इन्हें खुद को साबित करने दो !
इन्हें अपना कर्म करने दो, तुम अपना कर्म करो
कहीं और व्यापार करो!
कहीं और अपनी दुकान सजाओ!
पर विद्यालय के बाहर!
हे शिक्षा के व्यापारी !
शिक्षा से दूर रहो!
यही समाज को तुम्हारा योगदान होगा ।
धन्यवाद 🙏

दिन चुनावी
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आ गये दिन चुनावो वाले

सारी बंद दुकाने खुल गई , बिन चाबी के खुल गये ताले

दिखा रहे ठेंगा रंगो को , कपड़े झक बगुला पर वाले

चहल-पहल बढी नुक्कड़ पर, लगे काम पर बैठे ठाले

बना विचारक घूमे, जिसने , विद्यालय में कदम न डाले

गरमागरम छिडी बहस में, आड़े तिरछे तीर निकाले

गली चौराहे घर आँगन में, राजनीति ने मोर्चे संभाले

बैठ मुंडेरी कागा सोचे , जैसे तैसे दिन ये निकाले

आ गये दिन चुनावो वाले ।।।।।।।

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मेरी बिटिया

इधर-उधर जिसे ढूंढ रही थी
सुख मिला वो घर के आँगन में
एक नया जीवन पाया
मैंने बिटिया के बचपन में
चलती है जब डगमग सी
फूलों की डाली झुकती है
टूटे फूटे बोलों में
सतरंगी धुन बजती है
नवदल जैसे हाथों से
आँचल जब धर लेती है
छूकर मखमली पोरों से
सारी व्यथाए हर लेती है
अस्त व्यस्त कर देती है
तब तनिक क्रोध जो आता है
वो दूर खड़ी हंस देती है
घर मन्दिर सा बन जाता है ।
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एक प्रश्न
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गिद्ध सी दृष्टि,
सियार सी नीति
डसना सांप सा,
आंसू घड़ियाली
रंग बदलना –
गिरगिट जैसा
चिकने घड़े सी
चमक निराली
और मनुष्यता ?
उत्तर दो !
हे! वीर मनुज
किसको दी ?
कहां गिरा दी ?

कैसे करूं नमन

तुमको कैसे करूं नमन
स्वीकार करो हे ! वीर अश्रुजल, भर लाए जो नयन

हाय ! भाग्य निष्ठुर खेला कैसा खेल निराला
नव यौवन के द्वार खड़े फूलों को रज कर डाला

चले वेदी को महायज्ञ की अधरों पर मुस्कान लिए
तन पर गहने बेड़ी के लेकिन स्वतंत्र पहचान लिए

वरण मृत्यु का करने, निज शीश भेंट चढाने को
विदा ले चले अभिमानी नयी चेतना लाने को

स्वयं आया महाकाल करबद्ध करने अभिनंदन
स्वीकार करो हे! वीर अश्रुजल, भर लाए जो नयन
तुमको कैसे करूं नमन।।
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आज का कार्य

शीर्षक – मैं लेखनी हूं

निष्प्राण हूं लेकिन जीवन से भरी हूं
मैं लेखनी हूं
हां पुरातन हूं युगों सी फिर भी नयी हूं
मैं लेखनी हूं

अनगढ बिखरे शब्दों को संवारती हूं
मन के घुमडते भावों को निखारती हूं
देती हूं अबलंब भटकते मौन को मैं
कितने मूक प्रश्नों के हल निकालती हूं
जिसने सहारा मांगा उसका बल रही हूं
मैं लेखनी हूं

धारा समय की मोड़ दूं, बल मुझमे है
है भोर नयी जिसमे वो, कल मुझमे है
है शक्ति से अनभिज्ञ मेरी क्यों मनुज
उठा मुझे कि तेरी हर पहल मुझमे है
आकार पे न जा कि मैं पारस मणि हूं
मैं लेखनी हूं ।

जय जवान

धधकती ज्वाला ह्रदय में
अधरों पे देश आरती
देने निज आहुतियां
चले हैं वीर भारती ,
प्रचंड मान गर्जना
अदम्य साहसी निडर
अचल अखंड खंड खंड
हिम बुहारती डगर,

सुन दहाड़ अस्त्र की
अरि दल दहल रहा
दसों दिशाएं कांपती
रंग नभ बदल रहा,
विजय सदा सहाय है
ध्वजा गगन विराजती
कोटि कोटि पग बढे
जब धरा पुकारती ।
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विश्व गौरैया दिवस
20 मार्च

सूना आँगन तुम्हे बुलाए सोन चिरैया आओ ना
चीं चीं चीं चीं चिटर बिटर मीठा गीत सुनाओ ना
ऐसी भी क्या बात हुई गुमसुम सी क्यों बैठी हो
कहां बनाया नया ठिकाना नही दिखाई देती हो
दाना पानी रोज रखो जी अम्मा से हम बोलेंगे
अब से हरदिन संग तुम्हारे हम सब बच्चे खेलेंगे ।।

“अल्फाज ”
आज का कार्य -देखता जा

बुरा तो लगेगा मगर देखता जा
अपने किये का असर देखता जा

बेजुबा की आंखों से छलकता पानी
लायेगा कैसा कहर देखता जा

घायल बचपन के हाथों जो होगा
बुढ़ापे क्या तेरा हश्र देखता जा

कयामत के दिन होगा तेरा फैसला
मजलूम का तू सबर देखता जा

खुश है कैद जुगनुओं को करके
अब स्याह रास्ते का सफर देखता जा ।

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