चांद और कान्हा

हठकर मांग रहे मैया से
नटखट चांद खिलौना
नही चाहिए माखन मिश्री
ना चांदी ना सोना
मैया बोली लाल मेरे मैं
कैसे तुझे बताऊं
चांद नही है कोई खिलौना
कैसे तुझे दिलाऊं
नही सुना कुछ भी कान्हा ने
जा लेटे धरती पर
मैया ने सोचा थोड़ा सा
वापस गई पलटकर
एक बर्तन में पानी भरकर
लाल को चांद दिखाया
उसको पाकर नन्हा कान्हा
फूला नही समाया ।

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हुआ सवेरा

सूरज निकला हुआ सवेरा
भागा डरकर दूर अंधेरा
हुआ गुलाबी नीला अंबर
मुक्त तरंगे करता सागर
सुनो कहे क्या शीतल धारा
बढते बढते मिले किनारा
कभी ना थकना कभी न रुकना
जीवन है बस चलते रहना
उठो हुआ बस बहुत आराम
कर लो ये दिन अपने नाम ।
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पैसा

पैसा
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देखिये ये पैसा क्या कमाल कर गया
हंसी लबों से लूट के कंगाल कर गया
वो जिसके लिए कांटो पे गुजार दी उम्र
आंखो को आंसुओं से लाल कर गया
पल भर में गैर कह के तोड़ डाले सब भरम
जख्मों से इस दिल को मालामाल कर गया
जज्बात चूर चूर हैं बेरंग है मंजर
सीने में तूफान है क्या हाल कर गया
वफा के बदले दे गया हजार तोहमत
जादूगर था काम बेमिसाल कर गया ।

सपना सक्सेना
नोएडा

लडा भिड़ा के रखें प्रजा को , जनसेवा की चालें
मैं मेरा में डूब मरे सब,देश को कौन संभाले

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करो प्रणाम

सुबह को उठकर पहला काम
सभी बड़ों को करो प्रणाम
बिस्तर छोड़ो हाथ मुँह धोलो
ठंडे जल से ताजा होलो
बाहर निकलो कदम बढाओ
संग हवा के घूम के आओ
हर दिन जो ये काम करोगे
हष्ट पुष्ट और स्वस्थ रहोगे ।

अलफाज
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बेसबब बेइंतहा बेहद परेशान हूं मैं
वक्त तेरी चालों पर बड़ा हैरान हूं मैं

खोल कर रखे हैं खिड़कियां दरवाजे सब
बरसों से बंद पड़ा खुला मकान हूं मैं

बात उसूल की हो तो साथ छोड़ देता हूं
दोस्तों की नजर में बड़ा बेईमान हूं मैं

कहीं भी रुख करो मिलोगे मुझसे आकर
आखिर समंदर हूं दरिया का जहान हूं मैं

बेशक नाज रख अपनी दौलत पे ऐ जमीं
मेरी हद से निकल कर दिखा आसमान हूं मैं

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पाप उपज है सोच की, तन पर बंधन देत
शील बीजो अंतर में, मद विकार हर लेत 🙏

हवा का चित्र

सोचा है सबको दिखलाऊ
एक हवा का चित्र बनाऊं
सुन्दर घेरेदार घाघरा
सागर जैसी लहरों वाला

कोमल कोमल पत्तों जैसा
चूनर का रंग हरा हरा सा
बादल जैसे काले केश
हिम का शीतल हार विशेष
फूलों जैसा सुंदर मुखड़ा
आपदमस्तक चांद का टुकड़ा
किंतु प्रश्न खड़ा है मौन
भाई हवा को देखे कौन ?

प्यारी धरती
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जैसे कोई गोल नारंगी
धरती प्यारी रंग बिरंगी
गहरे नदिया झील समंदर
ऊंचे झरने चढते अंबर
हिम शिखरों पर तिरते बादल
रवि किरणों को हरते जंगल
रूपहली चादर से मरूस्थल
कहीं घनघोर बरसते जलदल
कितना देती कितना सहती
मेरी प्यारी प्यारी धरती ।
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एक के बाद एक वही ह्रदय विदारक घटनाएं । मासूमियत के दुश्मन नरपिशाच जंगली घास की तरह फैलते ही जा रहे हैं ।कैसी परवरिश मिली है इनको ? कहां से कुविचार पैदा होते हैं ?
संवेदनाओं से परे निकृष्ट मानसिकता !
घोर निंदनीय अस्तित्व !
घर ,परिवार, समाज, कानून , आत्मा, परमात्मा किसी का भय नही । कुकृत्य पर कोई ग्लानि कोई पश्चाताप नही ।
और जो उनके सहायक है उनका तो जीवन ही व्यर्थ है ।