नारी
——

कब कहा मैंने मेरा
देवी कह सत्कार करो
कब कहा पूजा मुझको
चरणों में उपहार धरो
मैं मानव हूं तुम जैसी
मुझको वो ही रहने दो
अन्तर्मन में छिपी व्यथा
कहती हूँ जो कहने दो
निर्मल कोमल निर्झर सम
निज मार्ग पर रहती हूं
लोचन अंतस शीतल कर
परमार्थ ही बहती हूं
क्यों बांध रहे हो धारे को
कुत्सित क्लिष्ट चालों से
अपने भाग का दीप्त अणु
ले ही लूंगी उजालों से
न रोक सकोगे रश्मि पथ
मुट्ठी भर अंधेरों से
निकल निकल प्रवाहित होती
सरिता कंटक घेरों से
जो जीवन ने बांटा है
हर उस सुख की अधिकारी हूं
जो श्रेष्ठ तुम तो अपार हूं मैं
सहभागी हूं मैं नारी हूं …

सपना सक्सेना
स्वरचित

पिता
——-
महकता आंगन
बरसता सावन
होली के रंग
मेले उमंग
दीवाली की शान
मां का अभिमान
दोस्तों में अकड़
सहेलियों पर पकड़
शाम की दिया बाती
सुबह की आरती
छप्पन पकवान
महफिल में गुणगान
ये सारा दिखावा
तुमसे है पापा … ..👩

सपना सक्सेना
स्वरचित

हर पल
——-

हर पल फिसल रही मुट्ठी से
रेत समय की हौले-हौले
बांच रहा है भाग्य का लेखा
कर्म धर्म की पोथी खोले

पल पल रीत रही रे बंधु
भरी गगरिया लम्हों वाली
बहती रहती अथक सरिता
नहीं कभी भी रुकने वाली

जीवन कश्ती साथ लहर के
बढ़ती जाये रुके कभी ना
ठहरा हुआ निर्जीव ही जानो
राही हरपल चलते रहना …..

सपना सक्सेना
स्वरचित

कविता
——–

लौट चला है सूरज घर को
दिनभर के निबटा कर काम
समय का मंच संभाल रही है
मुस्काती इठलाती शाम

सजा रही है आंगन नभ का
झिलमिल चांद सितारों से
गूंज रही हैं दसो दिशाएं
पंछियों की पुकारों से

महक रहे हैं आंगन आंगन
द्वारे द्वारे दीप जले
लेकर अपनी खरी कमाई
आंख के तारे घर को चले….

सपना सक्सेना
स्वरचित

एक गीत 🙏

तस्वीर
———
भावनाओं के रंगो से
गीतों की तस्वीर बनी
फूल सजाए शब्दों के
सुर वाली जंजीर बनी
अक्षर अक्षर नाच रहा है
साथ कलम की थिरकन पर
ठहरावों के चांद सजे हैं
लय ताल की बिखरन पर
गूंज रही हैं मन की कूकें
शांत पलों के बिरवा में
बुला रही हैं पास प्रिय को
मन महकती पुरवा में
आ जाओ जो प्रियवर तुम तो
जीवन का संगीत सजे
धीमे-धीमे दरिया जैसे
बूंद बूंद से गीत बने …..

सपना सक्सेना
स्वरचित

शहर अजनबी
—————–

ना ज़मी ना बसर हादसों का शहर
हम चले छोड़कर बेबसों का शहर

हो मुबारक तुम्हें है तुम्ही पर फ़िदा
अजनबी -अजनबी दोस्तों का शहर

मौन रहता है जो हर समय हर घड़ी
खोए खोए हुए रास्तों का शहर

आए जिसके लिए कितने दिल तोड़कर
खो गया है कहीं हसरतों का शहर ..

सपना सक्सेना
स्वरचित

गीत
—–

लिखने बैठी बातें जिया की
सोचूं.. तुमको लिख दूं क्या …
देख ही लेना पढ़ के , दिल में ..
कितना है अनुराग भरा …..

सोच रही हूं ..तुमसे कह दूं
जब जब छाये ..काले बदरा ..
तुम क्या जानो ..हाल जिया का
बह बह के ..रह जाये कजरा
रोक रहे हैं हाथ ये आंसू
थोड़ा लिखा बहुत समझना …..

आ भी जाओ… तुमको बुलाएं
भीगी भीगी सी… ये राहें
लाज के मारे ..कह न पाऊं
जाने क्या-क्या ..कहती हैं बाहें
लौट ना जाये तुम बिन सावन
चल देना.. खत जैसे ही पढ़ना …

सपना सक्सेना
स्वरचित

कलम
——

इतिहास गढ़ता हूं
तकदीर रचता हूं
बेमिसाल ईजाद हूं
बस छोटा दिखता हूं

जिधर चल दूं
जमाना चलता है
अपनी आहट से
धड़कन लिखता हूं

ना आंखे हैं
न जुबान फिर भी
हर शय पर
गिरफ्त रखता हूं

तुम ही रखो
शौक हथियार का
कलम हूं !
तेज धार रखता हूं

जिद पर आ जाऊं
तो कदमों में ले आऊं
प्यार से खरीदो
कौड़ी में बिकता हूं ।

सपना सक्सेना
स्वरचित

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प्रणाम 🙏

गुरूर
——-
गीत गज़ल में मत बांधो
जो कहना है वो कहने दो
गुरूर नहीं , एक दरिया है
जज्बात कलम से बहने दो…

सीधा-सादा दिल है ये
पर पीड़ा में रो उठता है
हलचल जैसे सागर में
दर्द कहीं पर चुभता है
जो पाया वो लिख डाला
है ख़ता अगर तो करने दो…

और किसी के पदचिह्नों पर
चलना मुझे मंजूर नहीं
हालात के आगे झुक जाऊं
ऐसी भी मजबूर नहीं
या तो मेरे साथ चलो
या फिर तन्हा रहने दो ……..

स्वरचित
सपना सक्सेना