चौपाई
—‘——

मातु देवकी जन्म दिलाई,
बचपन के सुख जसमति पाई ।
गोकुल में आखों के तारे,
गिरवर धारी नंद दुलारे ।।

बाल समय में माटी खाई ,
जसमति माई मारन आई ।
जब तूने मुख् खोल दिखाया,
उसमें था ब्रह्मांड समाया ।।

पूतना मारी कंस को मारा ,
जनम जनम के दुख से तारा ।
आन बसो हिय जानि धामा,
निसदिन जपते राधा नामा ।।

प्रणाम 🙏
आज की प्रस्तुति
ग़ज़ल
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2122 2122 2122 212

ग़ज़ल
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रात भर मेरा तडपना और जलवा चांद का
क्या कहें दिल का धडकना और जलवा चांद का

वो नही आये मगर कोई कसक होती रही
मुस्तकिल यादें बरसना और जलवा चांद का

तुम मेरे हो ये यकीं होने तलक रुकते जरा
तीर सा तेरा निकलना और जलवा चांद का

कट गई थोड़ी बहुत जो साथ तेरे जिन्दगी
याद कर कर के सिसकना और जलवा चांद का

आखिरी पैगाम पहुचे कातिलों के पास में
उम्र भर उनका तरसना और जलवा चांद का…

सपना सक्सेना
ग्रेटर नोएडा

जीवन -मृत्यु
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जीवन दो पल
मृत्यु अटल
हर पल जीना
निखर नवल
जो होना है
होके रहेगा
लेकिन जाता
पल न रुकेगा
जीवन के पल
खिलने दो
रंगो में रंग
मिलने दो
खुशियों के
रस पीने दो
हंस के जियो
और जीने दो …

सपना सक्सेना
स्वरचित

चल दिए छोड़ के
किससे कहूं जो रोके
ना जाओ सुनो तो ……
अब ना होगी वो मुस्कान मीठी
वो बातें हठीली कोमल तीखी
जो महकेगी याद कभी तो कहेंगे
अटल थे सदा अटल ही रहेंगे …….😢🙏🙏🙏

मेरा हिंदुस्तान
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झूम झूम के गाए तिरंगा गाथा देश महान की
ठाठ अलग हैं बात अलग है मेरे देश महान की

लाख लगाए कोई पहरा जीत नहीं रुकने वाली
भाई भाई के अमर प्रेम की रीति नहीं मिटने वाली
दुश्मन की तोपों पर भारी दहाड़ वीर बलवान की ….

जो भी इस धरती पर आया उसको ही सत्कार मिला
भेदभाव का नाम नहीं है सबको बराबर प्यार मिला
प्रेम भाव से मिलकर रहना छोड़ो बात नादान की

ठाठ अलग हैं बात अलग है मेरे हिंदुस्तान की ….

सरहद की पहरेदारी में मेरे वीर जियाले हैं
जिनकी लहू की बूंदों से घर-घर में उजाले हैं
श्रद्धा से सिर झुक जाते जब बात छिड़ी जवान की

ठाठ अलग हैं बात अलग है मेरे हिंदुस्तान की ….

स्वरचित
सपना सक्सेना

मेरा हिंदुस्तान
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झूम झूम के गाए तिरंगा गाथा देश महान की
ठाठ अलग हैं बात अलग है मेरे देश महान की

लाख लगाए कोई पहरा जीत नहीं रुकने वाली
भाई भाई के अमर प्रेम की रीति नहीं मिटने वाली
दुश्मन की तोपों पर भारी दहाड़ वीर बलवान की ….

जो भी इस धरती पर आया उसको ही सत्कार मिला
भेदभाव का नाम नहीं है सबको बराबर प्यार मिला
प्रेम भाव से मिलकर रहना छोड़ो बात नादान की

ठाठ अलग हैं बात अलग है मेरे हिंदुस्तान की ….

सरहद की पहरेदारी में मेरे वीर जियाले हैं
जिनकी लहू की बूंदों से घर-घर में उजाले हैं
श्रद्धा से सिर झुक जाते जब बात छिड़ी जवान की

ठाठ अलग हैं बात अलग है मेरे हिंदुस्तान की ….

स्वरचित
सपना सक्सेना

काग़ज
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बचपन कोरे काग़ज जैसा
सोच समझ कर भरना रंग
एक बार जो चढ़ जाये तो
जीवन भर फिर रहेगा संग
अनुशासन की कलम से लिखना
प्रेम और संयम की भाषा
दृढनिश्चय की स्याही से
सजी हो हर अभिलाषा
परहित और परोपकार संग
लिखना सबको दें सम्मान
विद्या धन से रहे सुशोभित
पायें जग में आदर मान ….

सपना सक्सेना
स्वरचित

हम शर्मिंदा हैं
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मानव कहने में भी तुम्हें …
आज जुबां रुक जाती है
तुम जो न करते लजे ,वो….
सोच आंख झुक जाती है ,

कैसे पाली तुमने अपनी …
क्या वो ही सिर्फ तुम्हारी है ?
परायी नन्ही कलियां क्या…
नही जीने की अधिकारी हैं ?

क्या इतनी अंधी नजरें थी ..
जो देवी नही दिखाई दी !
मर गई है आत्मा क्या …..
जो पीड़ा नही सुनाई दी !

हाथों में कोढ नही फूटा…
जो बिटिया तन पर ठहरे थे
कितना घिनौना रूप तेरा …
वो मन कितने उजले थे ….

उस पर निर्लज्ज हंसी तेरी
तीर जिगर पर चल जाते
तुमसे इंसानियत शर्मिंदा
इससे अच्छा तुम मर जाते 😠😠