बोलो कैसे गया विवेक ?
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पूछे जनता उत्तर दो, सीधा-सादा प्रश्न है एक
बुद्धि हीन हे वर्दीधारी, बोलो कैसे गया विवेक ?

क्या सड़के हैं नागिन जैसी, या रात मैं उतरी बला
या धुंध धी ताकत वाली, कुछ नही कैसे पता चला

खुले आम घूमे अपराधी, संग सुरताल मिलाते हो
निष्क्रिय जंग लगे से पड़े नज़र तुम आते हो

आम आदमी सीधा साधा ,दाल रोटी में पागल जो
रात बिरात भटकता दर दर, आतंकी तुम्हे लगता वो

सारी ताकत झोंक दी उसपर, अपना बल दिखलाने में
कैसे रक्षक तुम जनता के, बेहतर पागलखाने में

ना कर्तव्य का बोध तुम्हें, मानवता कहां आये फेंक
बुद्धिहीन हे वर्दीधारी, बोलो कैसे गया विवेक ?

सपना सक्सेना
स्वरचित

धरा पुकारती
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प्रदूषण की मार से
धरती हुई बेहाल
कौन सुने, किससे कहे
अपने दिल का हाल
हरियाली सब लील गये
पथरीले जंगल
गहराते ही जा रहे
आफत के बादल
तकनीकों के मोह में
ऐसा फंसा संसार
जहरीली हवा हुई
कीच नदी की धार
आबादी का बोझ बढ़ा
हुए खजाने खाली
त्राहि-त्राहि सृष्टि करे
देख अपनी बदहाली
सुखपूर्वक जीना हो
जो मानव जीवन
शुद्ध हवा और पानी का
मिलकर करो प्रयत्न
कचरा करकट दूर रखो
पानी में न बहाओ
रहे कहीं न धरा रीती
हरियाली उपजाओ।
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क ख ग घ को पहचानो
मैं हिंदी हूं अपनी मानो
मान करो सम्मान करो
निज बोली पर अभिमान करो
अंग्रेजी के फंदे तोड़ो
मातृभाषा से नाता जोड़ो
हेलो हाय को बाय करो
हाथ जोड़ प्रणाम करो ।
🙏

गीत
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कभी बंद कभी हड़तालें कैसी लूट मचाई रे
पिसता है हर बार गरीब मेरे मालिक राम दुहाई रे

कभी अन्न तो कभी सब्जियां
कचरे में फिकवाते हैं
दूध का दरिया खुलेआम
सड़कों पर बहाते हैं
बूंद बूंद को बच्चे तरसे इनको लाज ना आई रे

जब मन चाहा राह रोक दी
संपत्ति का नुकसान किया
जान माल की हानि इतनी
करके तुमको मिला है क्या
जोश जोश में खेल बिगाड़ा बात समझ भी न आई रे

मेहनत की रोटी का बंधु
ऐसे मत अपमान करो
कुनीति के जाल में फंसकर
ना अपनो को परेशान करो
जियो चैन से जीने भी दो छोटी उमरिया पाई रे …..

सपना सक्सेना
ग्रेटर नोएडा

अल्फाज
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बांट रहे हो जाति धर्म में मानव के सम्मान को ,
सत्ता सुख के लिए बिकाऊ कैसे तुम इंसान हो …..

कल तक जिसके गीत सुनाए
चरणों में सिर डाल दिया …
आज उसी के नाम का सिक्का
चौराहे पर उछाल दिया …
किसी एक के रहे कभी ना जग ज़ाहिर बेईमान हो
सत्ता सुख ………..

भूखी प्यासी बेबस जनता
कैसे कैसे बहकाते हो…
कभी आरक्षण कभी कीमतें
नित नई आग लगाते हो….
काठ की हांडी एक बार ही भूल गए ..नादान हो
सत्ता सुख …………

अपनी करनी याद नही
दूजे के दोष गिनाने में….
लगा दिया है बल सारा
तीन को पांच बनाने में …..
जिसकी खातिर चुने गए उसी से बस अंजान हो
सत्ता सुख…….

सपना सक्सेना
ग्रेटर नोएडा

धरती की बात दूर है तस्वीर हम ना देंगे
कश्मीर हमारा है कश्मीर हम ना देंगे

जुलमो सितम की इंतिहा अब होने लगी है
रंगत सुहाने स्वर्ग की भी खोने लगी है
दुश्मन की शातिराना चालों का असर है
सुर्ख, हिमालय की हिम होने लगी है
नफरत के बीज उगने नही हम चमन में
दिलों को जोड़ती सी जंजीर हम ना देंगे
कश्मीर हमारा है……. .

कहीं बम कहीं गोली कहीं पत्थर बरस रहे
अपने ही पहरेदारों के हाथों को कस रहे
नासमझ अपनो को पहचानते नहीं
ये नौजवान कैसे दलदल में धंस रहे
सरहद के पार से बस खंजर ही मिलेगा
वो वहशी कभी रौशन तकदीर नही देंगे
कश्मीर हमारा है ………

सपना सक्सेना
स्वरचित