वाह री वर्दी

वाह री वर्दी
**********

अंधी गूंगी बहरी वर्दी ,
सोई ठहरी ठहरी वर्दी ।

निर्धन का तो महाकाल है ,
धनवानों की चेरी वर्दी ।

कानूनों को जेब में रखती
हत्यारों की प्रहरी वर्दी ।

रौब और खनक की कायल ,
ना तेरी ना मेरी वर्दी ।

उम्मीदों के दीए बुझा दो ,
काली घोर अंधेरी वर्दी ।

मानवता की नमी नदारद ,
लपट भरी दोपहरी वर्दी ।

कैसे साया बने किसी का ,
आखिर वर्दी ठहरी वर्दी ।
****************(

सपना सक्सेना
स्वरचित

4 thoughts on “वाह री वर्दी

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s